HISTORY

स्वर्ग द्वारे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा नागेश्वरं शिवम् |
पूजयित्वा च विधिन्वत सर्वान कामानवाप्नुयात ||

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम की जन्म भूमि अयोध्या से कौन नहीं परिचित होगा यह वैराग्य भूमि एवं मंदिरों की नगरी है यहाँ पर मंदिरों की संख्या लगभग ७ हज़ार है |

सरयू नदी के किनारे स्वर्ग द्वार में स्थित श्री नागेश्वर नाथ मंदिर अपना अलग एवं विशेष महत्वा रखता है, अत्यंत ,प्राचीन ऐतिहासिक , धार्मिक इस मंदिर की स्थापना आज से लाखों वर्ष पूर्ण भगवान राम ले कनिष्ठ पुत्र चिरंजीव श्री कुश जीने की थी  |

जिस समय भगवान राम अपने निज धाम को जाने लगे तो अयोध्या का राज्य श्री अंजनीनन्दन एवं चिरंजीव कुश को कुशावर्त क्षेत्र  (कुशावतीनगर )  का राज्य दे गये थे , अपने राज्य का संचालन करते हुए श्री कुश जी को अयोध्या दर्शन की इच्छा जाग्रति हुई इस विचार से वे अयोध्या आये एवं स्वर्ग द्वार तीर्थ में स्नान करने लगे तत्क्षण उनके हाँथ का स्वर्ण कंकण सरयू जी के जल में गिर गया जिसे कुमुदनाग की कन्या कुमुदनी ने ले लिया , जब खोज करने पर भी कुश जी को कंकण नहीं मिला तो विचार करने लगे की यहाँ कुमुद नाम का एक नाग रहता है उसी ने हमारा कंकण लिया होगा , यहाँ विचार आते ही क्रोध युक्त हो उस नाग का मारने की प्रतिज्ञा करने लगे , उधर कुमुद ने सोचा अब कुशल नहीं है और वह भयभीत होकर अपने इस्टदेव आशुतोष भगवान शंकर की प्रार्थना करने लगा तब श्री भोलेनाथ शंकर ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिया एवं कुश जी से कहा ”  कुमुद नाग क़ो अभय दो ” इसी हेतु हम आये है |

भगवान शंक रक़ो देख , इस बात क़ो सुनते ही श्री कुश जी ने धनुष वाण रख दिया एवं साष्टांग प्रणाम कर उनका षोड़षो प्रकार से पूजन किया और कहा की नाग की प्रार्थना पर प्रसन्न होकर आप आये इसलिए नागेश्वर नाथ के नाम से आपकी प्रसिद्धि हो | यही स्वर्ग द्वार पवित्र तीर्थ में नागराज के संरक्षणार्थ श्री कैलाशनाथ भगवान शंकर जी आये इसी से इन का नाम नागेश्वरनाथ पड़ा |

त्रेता युग से आज तक अनेकों बार मंदिर बना और बिगड़ा पर विग्रह वही है , अंतिम बार विक्रमादित्य जी के द्वारा इस मंदिर का निर्माण हुआ जिनकी बत्तीस पुतलियां अभी प्रांगण में स्थित है | भारत वर्ष १०८ के ज्योतिर्लिंगों में इन की गणना है |

स्वर्ग द्वार स्थित इस मंदिर के उत्तर पूर्व एवं पश्चिम में- ३ विशाल दरवाजे हैं , गर्भ गृह में नागों से वेष्टित प्रधान शिवलिंग है |

अर्ध्य गोलाकार है यह विषेशता है , सम्मुख मातेश्वरी जगदम्बा माँ के दिव्य दर्शन है | मंदिर से बहार प्रांगण में दक्षिण भिसुंडि श्री गणेश जी हैं एवमं नंदिकेश्वर के श्री विग्रह सुंडी के सम्मुख हैं , इस के अतिरिक्त बगल में राम मंदिर एवं नंदिकेश्वर के दर्शन हैं | मंदिर के बाहर स्तंभों पर गणो एवं देवी -देवताओं के विग्रह हैं जो मूर्तिकला की दृष्टि से बड़े ही महत्वपूर्ण दर्शनीय हैं | वर्त्तमान समय में मंदिर की सम्पूर्ण व्यवस्था एक सार्वजानिक ट्रस्ट के अधीन है |

कार्यरत मंदिर के नित्य सेवा हेतु , अर्चकों समेत कुल लगभग बीस व्यक्ति सदैव सन्नद्ध रहते है | मंदिर प्रातः चार बजे से रात्रि नौ बजे तक भगतों के दर्शन पूजन हेतु खुला रहता है उसी अवधि में नित्य प्रातः मंगला आरती मध्यान्ह में राजभोग आरती सायं श्रृंगार आरती व शयन -आरती के कार्यक्रम होते है | नित्य ही हज़ारो की संख्या में भक्त भगवान भोलेनाथ के दर्शन पूजन हेतु आते हैं साथ प्रत्तेक मास शिवरात्रि क़ो बड़ी संख्या में तथा महाशिवरात्रि व अयोध्या में लगने वाले श्रवण , कार्तिक व चैत्र रामनवमी ले अवसर उस लाखों की संख्या में भक्तगण भगवान भोलेनाथ क़ो जलाभिषेक कर अपने क़ो धन्य समझते हैं |